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कृत्या का उद्देश्य
1- कविता की पुनर्प्रतिष्ठा
2-- भारत की सभी भाषाओं की कविता को विश्व मंच पर लाना
3-- भारतीय कविता परम्परा के पुराने अध्यायों को नए आयाम देना
4- विदेशी कविता के नए अन्दाज को पहचानना, उन्हें अनुवाद द्वारा
देशीय पाठकों को उपलब्ध करवाना
5-कविता प्रस्तुति के विभिन्न आयामों को तलाशना (नाट्य अभिव्यक्ति
इत्यादि)
कृत्या का लक्ष्य
1- भारतीय भाषाओं की महान काव्य परम्परा को एक अन्तर्राष्ट्टीय मंच
देना।
2- उत्सव में प्रस्तुत विदेशी भाषा की कविताओं को हिन्दी में
अनुदित कर के अन्य भारतीय भाषाओं में स्थान्तरित करना।
3- भारत की (चार प्रमुख भाषाओं की ) कविताओं को अंग्रेजी और अन्य
विदेशी भाषाओं में अनुदित करना।
4- कविता और अन्य कलाओं के मध्य एक सेतु प्रखायपित करना। रति सक्सेना
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कृत्या ने साहित्य के विशद संसार
में पहला कदम रख लिया । कइयों ने खुशी जाहिर की तो कुछ एक ने
आलोचना की । कृत्या दोनों की आभारी है!बच्चे का
पहला कदम चाहे कितना लड़खड़ाता क्यो ना हो माता पिता के लिए
उत्सव का सबब बन जाता
है, क्यों कि पहले कदम में चलना ही नहीं बल्कि दौड़ना, चढ़ना और उड़ना
भी निहित होता है । कृत्या के पहले कदम ने कविता प्रेमियों को
उत्सव मनाने का अवसर दे दिया । १८ जून को केरल के तिरुवनन्तपुरम
शहर के म्यूजियम आडिटोरियम में "कवितोत्सव" मनाया गया। अन्य कलाओं जैसे अभिनय
, नृत्य, संगीत और चित्रकारिता में भी है कवितोत्सव में इन सब
कलाओं की उपस्थिति थी
जिन दिनों कृत्या का बीज
दीमाग में जड़ जमा रहा था उन दिनों एक चाह मन में
रही थी कि कृत्या
की जड़ें कन्या कुमारी से कश्मीर और जैसलमेर से कामाक्षी तक फैलें....
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कृत्या अपने जन्म के तुरन्त पश्चात से ही समाचार में रही, हालाँकि
हमारा मकसद मात्र समाचार बनाना नहीं था,किन्तु कृत्या के कार्यों
को समाचार पत्रों में स्थान मिलता रहा। यही नहीं केरलीय दूरदर्शन
में भी इसकी काफी धूम रही.
दक्षिण में स्थित होने के कारण इसे अंग्रेजी
और दक्षिणी भाषाओं में
अधिक प्रसिद्धी मिली, किन्तु हिन्दी जगत का ध्यान भी इसकी ओर गया।
हालाँकि हम समझते हैं
इस बार के आयोजन के मुख्य विषय –निष्कासन, पीड़ा और इससे मुक्ति पर
न केवल विविधरंगी कविताएँ सामने आईं, ; तीन दिन, दुनिया भर के
साठ कवि, जिनमें एक तिहाई भारत से और अनुभव एक कविता सा।
जैसे सात
साल की प्रांजुला सिंह की कविता हिंदी,अँगरेज़ी और स्पेनिश में
सुनने को मिली तो अनुवाद के अनगिन रंग, भाषाओं के स्वाद और वाचन
वैविध्य की मधुरता की मनोरम स्मृतियाँ छोड़ गया यह आयोजन।
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कृत्या की शुरुआत एक वेब पत्रिका के द्वारा हुई थी जिसके पश्चातल
में कविता को विश्व पटल में लाने की कोशिश
थी। यह कोशिश काफी कुछ
ऐसी थी जैसी कि मिथक के अनुसार राम पुल

गिलहरी की कोशिश।
कृत्या को नेट पर देखते ही अय्यप्पा पणिक्कर ने कवितोत्सव मनाने का
सुझाव रखा था। उनका कहना था कि कविता को अन्य कलाओं से जोड़ने पर ,ही
हम आज के समाज से जोड़ सकते हैं।
अतः कृत्या पत्रिका के जन्म के तुरन्त बाद जून 2005 में पहला
कवितोत्सव मनाया गया,जिसमें कावालम पणिक्कर, दत्तन जैसे नामी
गिरामी कलाकारों ने भूमिका निभाई। दूसरा
कवितोत्सव जम्मू में किया
गया, जिसमें अग्निशेखर की अहम भूमिका रही।
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कृत्या विस्थापन के विभिन्न आयामों से गुजर चुकी है, विभिन्न
बिन्दुओं को तलाश रही है, और एक अन्तिम सहमती की ओर रास्ता बना रही
है।
इस सफर में कविता फिल्मों ने साथ दिया, साधो की उपस्थिति और ओदवे
की भारतीय कवियों पर बनाई गई फिल्में कविता के इस सफर को दृष्टि
देती रहीं। भारतीय कवियों की आवाज को ओदवे विश्व पटल पर ले कर
घूमी।

पश्चातल में कलाकार इन कविताओं में रंग भरते रहे, जिसे कि प्रांजल
आर्ट्स ग्वालियर से लेकर आया था।
कृत्या के सारथी डा श्यामला , डा जयश्री और अमित, विजेन्द्र, शलभा,
कृपाल थके नहीं बल्कि अधिक उत्साहित लग रहे थे।
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